मंगलवार, 9 नवंबर 2010

मरजाना अमीबा ये एककोशीय जीव होता है ...Amoeba single celled organism

एक पुराना गुर रट्टा ..... Cram an old method
यूँ ही नहीं आ जाती किसी विषय में महारत उस के लिए करनी पडती है मेहनत और मेहनत भी तब होती है जब रूचि हो और रूचि जन्मजात नहीं होती जगानी पडती है जगा कर बढानी पडती है |
अनुकूल वातावरण मिले और आपकी रूचि में कोई रूचि लेने वाला हो और कोई उस रूचि को कोई सुपोर्ट करने वाला हो तो कामयाबी मिलती है जरूर
मेरे  कहने का मतलब ये है कि जब छोटी थी तो अपने को ओरों से अलग दिखने की चाहत में मे गणित के और सामान्य ज्ञान के या कोई भी ऐसी ज्ञान वर्धक बात जो की मेरी बड़ी तीन बहनों और पिताजी (बाउजी) से सुनती तो कक्षा में जा कर उस बात को अपनी बना कर कहना और फिर कई कई दिन बाद उस पहेली का जवाब देना तर्क वितर्क और ना नुकर,इतराना और फिर बताना से अचानक गणित में रूचि बन गई सुविधा के आभाव में रट्टा बजा बजा कर जो सवाल समझ न आना उसे याद कर लेना खेल बन गया |
कक्षा आठ की बात है मैं रट  रही थी अमीबा एककोशीय जीव होता है...... अमीबा एककोशीय जीव होता है ...........
ये नंगी आँख से नहीं दीखता............ इसको सूक्ष्मदर्शी की सहायता से देखा जाता है 
जोर जोर से बोल कर ....रट्टा दे रट्टे पे रट्टा  
ताहि तन्द्रा टूटी दीदी ने कहा जा बहार देख नाली में एक अमीबा मरा पड़ा है और मै किताब छोड़ भागी देखने अमीबा .......हा हा 
वो भी मरा हुआ ..........नाली में
देख-दाख के आयी और बताया नहीं दिखा 
 यहाँ  नजर आयी कमी .....सूक्ष्मदर्शी,एककोशीय,नंगी आँख से नहीं दीखता और तू पढ़ ...तू ही रट और तू ही लिख शिक्षा की 
फिर मैंने कितनो को ही नाली में अमीबा  दर्शन को भेजा स्कूल में 
पर अब आया वास्तव में ......... बिना सूक्ष्मदर्शी के ही...... समझ आ गया एककोशीय और नंगी आँख से नहीं दीखता ...............है ये मरजाना अमीबा 
जिज्ञासा  जागी तो मैडम जी से मांग कर ली सूक्ष्मदर्शी पर ............
 सुविधाओं के आभावों से जूझता हमारा स्कूल मुझे और सब को पाठ्यपुस्तक में ही दिखा सका सूक्ष्मदर्शी का चित्र  और...और वो मरजाना  अमीबा शायद आज तक भी नहीं ........
कई वर्षों के बाद एक बार क्लिनिकल लैब में सूक्ष्मदर्शी को पहचान कर जो सुखद अनुभव हुआ ब्यान नहीं कर सकती... .
 



     

8 टिप्‍पणियां:

इंदु अरोड़ा ने कहा…

एक पांच साल से चौदह साल के बच्चे के पास अपना ये सब सामान पर्सनल तौर पर होना चाहिए

सब एक एक

प्रिज्म,मैग्नेटिक कम्पास,चुम्बक,टोर्च,बायनाकुलर,ज्यामिति बाक्स,टेलीस्कोप,सूक्ष्मदर्शी,साधारण सूक्ष्मदर्शी, स्टेपलर,लेंस,गोलीय दर्पण,आयरन स्केल,मोमी और पानी के रंग,निब वाला पैन,स्याही

अन्तर सोहिल ने कहा…

हा-हा-हा
रोचक घटना है, बढिया लगी

प्रणाम

आशीष मिश्रा ने कहा…

बहोत ही रोचक विवरण दिया है आपने...............

Arvind Mishra ने कहा…

एक कम्प्लीट लिस्ट -
प्रिज्म,मैग्नेटिक कम्पास,चुम्बक,टोर्च,बायनाकुलर,ज्यामिति बाक्स,टेलीस्कोप,सूक्ष्मदर्शी,साधारण सूक्ष्मदर्शी, स्टेपलर,लेंस,गोलीय दर्पण,आयरन स्केल,मोमी और पानी के रंग,निब वाला पैन,स्याही
कुल सामानों का किट कितने का पड़ेगा ? बच्चों को कैसे मिले ? अभिभावक ही दें और उनके उपयोग का संस्कार डालें !

Arvind Mishra ने कहा…

एक कम्प्लीट लिस्ट -
प्रिज्म,मैग्नेटिक कम्पास,चुम्बक,टोर्च,बायनाकुलर,ज्यामिति बाक्स,टेलीस्कोप,सूक्ष्मदर्शी,साधारण सूक्ष्मदर्शी, स्टेपलर,लेंस,गोलीय दर्पण,आयरन स्केल,मोमी और पानी के रंग,निब वाला पैन,स्याही
कुल सामानों का किट कितने का पड़ेगा ? बच्चों को कैसे मिले ? अभिभावक ही दें और उनके उपयोग का संस्कार डालें !

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत-बहुत शुभकामनाएँ एवं आशीर्वाद!
--
आपकी पोस्ट की चर्चा बाल चर्चा मंच पर भी
की गयी है!
http://mayankkhatima.blogspot.com/2010/11/28.html

प्रकाश गोविन्द ने कहा…

आहा इंदु जी क्या कहूँ ....
आपने मुझे अतीत की याद दिला दी ..
जब मेरे पास अपना लैब हुआ करता था
घर के पिछवाड़े एक कोठरी थी वहां कबाड़ और लकड़ी के पटरे रखे रहते थे .. बस वही था मेरा लैब !
एक टीन के बक्से में दुनियी की बेशकीमती चीजें भरी रहती थीं .. उस बक्से का स्वामी मैं था ! मेरे सारे दोस्तों के लिए मेरा लैब कौतूहल और ईर्ष्या की चीज था !
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आपकी दी हुयी लिस्ट का सामान तो नहीं था लेकिन बहुत कुछ था उसमें - टार्च, बेकार सेल, दिशा-सूचक, कई तरह के लैंस, डिसेक्शन बॉक्स, कई तरह के चुम्बक, एक बेकार सा प्रोजेक्टर,,, और भी न जाने क्या क्या ....
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बस क्या बताऊँ इंदु जी .. घर वालों की लापरवाही से एक और एडिसन भारत में बनते बनते रह गया :)

बेनामी ने कहा…

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